रोम की कुँवारी और शहीद, संगीत की संरक्षिका · पर्व: 22 नवंबर

📖 स्तोत्र 96:1
सिसिलिया आरंभिक रोमी कलीसिया की सबसे सम्मानित शहीदों में से एक हैं। मिस्सा की रोमी कैनन (प्रथम यूखरिस्तीय प्रार्थना) में उनका नाम लिया जाता है और रोम के त्रास्तेवेरे में उनके नाम का एक प्राचीन गिरजाघर है।
उनके जीवन का विवरण पाँचवीं शताब्दी के अंत में लिखे एक बाद के वृत्तांत से आता है, जिसे इतिहासकार अधिकतर किंवदंती मानते हैं। उसके अनुसार, अपना कौमार्य ईश्वर को समर्पित कर चुकी सिसिलिया का विवाह वलेरियन नामक युवक से हुआ; वलेरियन और उसका भाई तिबुर्तियुस मन परिवर्तन करके शहीद हुए।
उसी वृत्तांत के अनुसार बाद में सिसिलिया गिरफ़्तार हुईं, तलवार से घायल होकर तीन दिन तक विश्वासियों को प्रोत्साहित करती रहीं और फिर मर गईं। 1599 में उनकी कब्र खोली गई और मूर्तिकार स्तेफ़ानो मादेर्नो ने उनकी प्रसिद्ध मूर्ति बनाई।
उनकी कथा मसीह को पूर्ण रूप से समर्पित हृदय दिखाती है।
उनकी साक्षी ने पति और देवर को मसीह तक पहुँचाया।
विवाह-भोज में वाद्य बजते समय वे हृदय में ईश्वर के लिए गाती रहीं; इसलिए संगीत की संरक्षिका।
वृत्तांत कहता है कि विवाह-भोज में वाद्य बजते समय उन्होंने अपने हृदय को शुद्ध रखने की विनती करते हुए केवल ईश्वर के लिए गाया।
1599 में कब्र खुलने पर जिस अवस्था में शहीद को पाया गया, उसी रूप में मादेर्नो ने मूर्ति गढ़ी।
सिसिलिया की कथा मसीह को पूर्णतः समर्पित हृदय दिखाती है।
प्रभु के लिए नया गीत गाओ (स्तोत्र 96:1)।
उनकी साक्षी ने पति और देवर को विश्वास तक पहुँचाया।
प्रिय भाइयो और बहनो, संत सिसिलिया उन शहीदों में हैं जिनका नाम मिस्सा की प्राचीन रोमी कैनन में लिया जाता है। उनकी कथा का बड़ा भाग बाद के वृत्तांत से आता है जिसे इतिहासकार अधिकतर किंवदंती मानते हैं; हम यह ईमानदारी से कहते हैं। फिर भी आरंभिक शताब्दियों से कलीसिया ने उन्हें प्रेम किया।
वह वृत्तांत कहता है कि विवाह-भोज में वाद्य बजते समय सिसिलिया हृदय में केवल ईश्वर के लिए गाती रहीं। स्तोत्र बुलाता है: प्रभु के लिए नया गीत गाओ (स्तोत्र 96:1)। संसार के शोर में क्या हम हृदय में ईश्वर के लिए एक गीत रख सकते हैं?
आज उन गायक-मंडलियों और संगीतकारों के लिए धन्यवाद दें जो हमें प्रार्थना में सहायता करते हैं, और होंठों से ही नहीं, जीवन से भी प्रभु के लिए गाएँ। आमेन।
हे प्रभु, संत सिसिलिया की मध्यस्थता से हमारी प्रार्थना स्वीकार कर, और हमें होंठों से ही नहीं, जीवन से भी तेरी स्तुति गाने दे। आमेन।