दमिश्क के संत योहन

मठवासी, ईशशास्त्री और भजनकार, कलीसिया के धर्माचार्य · पर्व: 4 दिसंबर

दमिश्क के संत योहन
St John of Damascus, fresco, 14th–15th century, Protaton church, Karyes, Mount Athos, Greece. Public domain, via Wikimedia Commons.
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ईश-वचन

📖 योहन 1:14

जीवन

योहन का जन्म लगभग 675 में दमिश्क में एक ख्रीस्तीय परिवार में हुआ, जो मुस्लिम ख़लीफ़ाओं के वित्त-प्रशासन में सेवा करता था। उन्होंने उत्तम शिक्षा पाई और स्वयं भी दरबार में पद संभाला।

आठवीं शताब्दी के आरंभ के आसपास उन्होंने सार्वजनिक जीवन छोड़ दिया और येरूसालेम के निकट मार साबा मठ में मठवासी बन गए, जहाँ उनका पुरोहिताभिषेक हुआ। वहाँ उन्होंने प्रार्थना, अध्ययन और लेखन किया।

जब बीज़ान्तिन सम्राट लियो तृतीय ने पवित्र प्रतिमाओं पर रोक लगाकर उन्हें नष्ट करना शुरू किया, योहन ने प्रतिमाओं के बचाव में तीन प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे। उनका तर्क था कि चूँकि अदृश्य ईश्वर देहधारी मसीह में दृश्य हो गया, इसलिए हम मसीह और संतों की प्रतिमाएँ बना सकते हैं, उनका आदर करते हुए, उनकी आराधना किए बिना। उनका महान ग्रंथ ज्ञान का स्रोत यूनानी आचार्यों के विश्वास का सार प्रस्तुत करता है, और उनके अनेक भजन आज भी पूर्वी कलीसियाओं में गाए जाते हैं।

लगभग 749 में मार साबा में उनकी मृत्यु हुई। 1890 में पोप लियो तेरहवें ने उन्हें कलीसिया का धर्माचार्य घोषित किया।

शिक्षाएँ

क्योंकि ईश्वर दृश्य हुआ

देहधारण पवित्र प्रतिमाओं की नींव है।

आदर, आराधना नहीं

हम प्रतिमाओं का आदर करते हैं; आराधना केवल ईश्वर की करते हैं।

गाता हुआ विश्वास

ईशशास्त्र भजन बन सकता है।

कथाएँ

प्रतिमाओं के रक्षक (इतिहास)

सम्राट के अधिकार से बाहर, मठ की सुरक्षा में रहकर योहन ने लिखा कि मैं पदार्थ की आराधना नहीं करता, बल्कि पदार्थ के सृष्टिकर्ता की, जो मेरे लिए पदार्थ बना।

प्रवचन

1. ईश्वर ने स्वयं को दृश्य बनाया

शब्द ने देह धारण की (योहन 1:14)।

2. प्रतिमाएँ और विश्वास

प्रतिमाएँ हमें स्मरण और प्रार्थना में सहायता देती हैं।

3. प्रार्थना करनेवाला ईशशास्त्री

अध्ययन और उपासना एक साथ।

प्रिय भाइयो और बहनो, दमिश्क के संत योहन एक ख्रीस्तीय थे जो ख़लीफ़ाओं के दरबार में पद पर थे, और फिर सब कुछ छोड़कर येरूसालेम के निकट मठवासी बन गए।

उनके समय में एक सम्राट ने पवित्र प्रतिमाओं को नष्ट करने का आदेश दिया। योहन ने एक सरल तर्क से उनकी रक्षा की: मसीह में अदृश्य ईश्वर दृश्य हो गया। क्योंकि शब्द ने देह धारण की (योहन 1:14), हम उनका मुख चित्रित कर सकते हैं। जब हम किसी प्रतिमा का आदर करते हैं, तो हमारा आदर उस व्यक्ति तक पहुँचता है जिसे वह दिखाती है।

हमारी कलीसिया पवित्र प्रतिमाओं, क्रूस और धर्मविधिक वस्त्रों से प्रेम करती है, क्योंकि वे हमें मुक्ति के रहस्यों का स्मरण कराते हैं। पर हम कभी प्रतिमाओं की आराधना नहीं करते; आराधना हम केवल ईश्वर की करते हैं।

योहन ने ऐसे भजन भी लिखे जो आज भी पूर्व में गाए जाते हैं। उनका ईशशास्त्र प्रार्थना था। इस उपवास काल में हम मसीह या मरियम की किसी प्रतिमा को देखें और उसके सामने प्रार्थना करें, और धन्यवाद दें कि ईश्वर ने हमें अपना मुख दिखाया है। आमेन।

प्रार्थना

हे प्रभु, दमिश्क के संत योहन की प्रार्थनाओं से वह सच्चा विश्वास, जिसकी उन्होंने शिक्षा दी, हमारी ज्योति बने, और हम देहधारी शब्द के रहस्य का सदा सम्मान करें। आमेन।