धर्मसंघी, हॉस्पिटलर भाइयों के संस्थापक, रोगियों के संरक्षक · पर्व: 8 मार्च
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योहन सियुदाद का जन्म 1495 में पुर्तगाल के मोंतेमोर-ओ-नोवो में हुआ। लगभग आठ वर्ष की आयु में वे अस्पष्ट परिस्थितियों में घर छोड़कर स्पेन के ओरोपेसा पहुँचे, जहाँ उन्होंने चरवाहे का काम किया। युवावस्था में उन्होंने सम्राट चार्ल्स पंचम के युद्धों में ओरोपेसा के काउंट के सैनिक के रूप में सेवा की, लापरवाह जीवन बिताया और कुछ समय के लिए अपना विश्वास खो दिया। बाद में उन्होंने सेविल के निकट चरवाहे और उत्तर अफ्रीका में मज़दूर का काम किया, जहाँ उन्होंने पुर्तगाली निर्वासितों के एक परिवार की सहायता की।
स्पेन लौटकर वे धार्मिक पुस्तकें और चित्र बेचने लगे, और लगभग 1538 में ग्रेनाडा में एक छोटी दुकान खोली। 20 जनवरी 1539 को उन्होंने अविला के संत योहन का प्रवचन सुना। वह उन्हें इतनी गहराई से बेध गया कि वे सड़कों पर पुकारने लगे, अपनी पुस्तकें और संपत्ति दे डाली, और ऐसा व्यवहार किया कि लोग उन्हें पागल समझने लगे। उन्हें राजकीय अस्पताल ले जाया गया और उनके साथ वैसा ही किया गया जैसा तब पागलों के साथ होता था, ज़ंजीरों और कोड़ों से। वहाँ उन्होंने देखा कि बीमार गरीबों के साथ कैसा व्यवहार होता है, और उनकी देखभाल का संकल्प लिया। अविला के योहन उनके मार्गदर्शक बने।
उन्होंने ग्रेनाडा में एक घर किराए पर लिया और बीमारों और बेघरों को वहाँ लाने लगे, कुछ को अपनी पीठ पर उठाकर, और रात को सड़कों पर उनके लिए भीख माँगकर। वे अपने हाथों से उनकी देखभाल करते, उन्हें नहलाते, खिलाते और उनके साथ प्रार्थना करते थे। तुई के धर्माध्यक्ष ने उन्हें ईश्वर के योहन नाम और एक धर्मवस्त्र दिया। मित्र और अनुयायी उनके चारों ओर एकत्र हुए, जिनमें अंतोन मार्तिन और पेद्रो वेलास्को भी थे, जो कभी कट्टर शत्रु थे।
1550 में, पहले से थके हुए, वे एक युवक को डूबने से बचाने के लिए बाढ़ भरी नदी में उतरे, और गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। 8 मार्च 1550 को ग्रेनाडा में उनकी मृत्यु हुई, कहा जाता है कि एक क्रूस के सामने घुटने टेके हुए। उनके साथी ईश्वर के संत योहन के हॉस्पिटलर भाई बने, जिन्हें 1572 में पोप संत पियुस पंचम ने स्वीकृति दी, और जो आज भी भारत समेत अनेक देशों में रोगियों की सेवा करते हैं। 1690 में उन्हें संत घोषित किया गया, और वे रोगियों, अस्पतालों और नर्सों के संरक्षक के रूप में सम्मानित हैं।
जब उन्होंने आरंभ किया, वे चालीस पार कर चुके थे और पीछे एक व्यर्थ जीवन था।
दुखियों के लिए जो कुछ किया जाता है, वह उनके लिए किया जाता है।
उन्होंने अपने उग्र उत्साह को एक बुद्धिमान पुरोहित के निर्देशन में रखा।
वे रात को सड़कों पर गरीबों को ढूँढ़ते थे।
रात को योहन कंधों पर टोकरी और बर्तन लिए ग्रेनाडा में घूमते और पुकारते: कौन अपना भला करता है? भाइयो, ईश्वर के प्रेम के लिए अपना भला करो। वे सिखाते थे कि गरीबों को देने से सबसे अधिक लाभ देनेवाले को होता है।
जब ग्रेनाडा के राजकीय अस्पताल में भीषण आग लगी, तो योहन बार-बार लपटों में दौड़े, बीमारों को उठाकर लाए और खिड़कियों से बिस्तर फेंके, और बिना चोट के बाहर आए। देखनेवालों ने इसे चमत्कार माना।
कहा जाता है कि योहन एक गरीब व्यक्ति के पैर धो रहे थे जब उन्हें उनमें प्रभु के घाव दिखे, और उस व्यक्ति ने उनसे कहा कि वे गरीबों के लिए जो कुछ करते हैं, मसीह के लिए करते हैं।
यदि हम ईश्वर की दया की आशा रखते हैं, तो जब तक हममें बल है, हम भलाई करने से कभी नहीं चूकेंगे।
ईश्वर के संत योहन, सेस्सा की डचेस को पत्र, सार
चालीस वर्ष असफल रहा व्यक्ति संत बना।
मसीह रोगियों में प्रतीक्षा करते हैं (मत्ती 25:40)।
देनेवाला ही सबसे अधिक पाता है।
प्रिय भाइयो और बहनो, कुछ संत पालने से ही पवित्र लगते हैं। ईश्वर के संत योहन उनमें से नहीं थे। वे बचपन में घर से भागे, चरवाहे का काम किया, युद्ध में गए, राह भटके, और जीविका के लिए पुस्तकें बेचीं। वे चालीस पार कर चुके थे जब एक प्रवचन ने उनका हृदय तोड़ दिया। यदि आपको लगता है कि आपका जीवन इतना दूर जा चुका है कि ईश्वर उसके साथ कुछ नहीं कर सकता, तो आज के संत के पास आपके लिए कुछ कहने को है।
लोगों ने उन्हें पागल समझा। पागलों के एक अस्पताल में उन्हें कोड़े लगे। पर वहीं, ज़ंजीरों में जकड़े और पीटे गए लोगों के बीच, उन्होंने अपनी बुलाहट पाई। ईश्वर प्रायः उसी स्थान से हमसे बोलता है जहाँ हमारा अपमान हुआ हो। योहन उस अस्पताल से यह संकल्प लेकर निकले कि बीमार गरीबों के साथ स्वयं मसीह जैसा व्यवहार होना चाहिए।
येसु ने हमें यह साफ़ बताया कि सबसे छोटों में से किसी एक के लिए जो किया जाता है, वह उनके लिए किया जाता है (मत्ती 25:40)। योहन बीमारों को पीठ पर उठाते, उन्हें नहलाते, रात को उनके लिए भीख माँगते और पुकारते थे: भाइयो, ईश्वर के प्रेम के लिए अपना भला करो। जिससे पैसा माँगा जा रहा हो, उससे यह कहना आश्चर्यजनक है। वे जानते थे कि लेनेवाले से अधिक लाभ देनेवाले को होता है।
आज उस बीमार व्यक्ति के बारे में सोचें जिससे हम मिलने नहीं गए, उस वृद्ध माता या पिता के बारे में जो बोझ लगते हैं, और उनके बारे में जो हमारे अस्पतालों और घरों में रोगियों की सेवा करते हैं। उन सबको इस पवित्र मिस्सा / पवित्र कुर्बाना में लाएँ, और जब तक हममें बल है, ईश्वर के संत योहन से उनके हाथ और उनका हृदय माँगें। आमेन।
हे ईश्वर, तूने ईश्वर के संत योहन को करुणा की आत्मा से भर दिया। उनकी प्रार्थनाओं से हमें यह वरदान दे कि हम रोगियों और गरीबों में तेरी सेवा करें, और अंत में उनमें गिने जाएँ जिनका तू अपने राज्य में स्वागत करता है। आमेन।