मठवासी और यहूदिया के मरुस्थल में मठों के संस्थापक · पर्व: 5 दिसंबर

📖 स्तोत्र 46:11
साबास का जन्म 439 में आज के तुर्की के कप्पादोकिया में हुआ। बालक अवस्था में ही वे एक मठ में प्रवेश कर गए, और लगभग अठारह वर्ष की आयु में येरूसालेम और यहूदिया के मरुस्थल में चले गए, जहाँ उन्होंने संत यूथिमियुस जैसे महान मठवासियों के मार्गदर्शन में जीवन बिताया।
किद्रोन घाटी के ऊपर एक गुफा में वर्षों के एकांत के बाद उनके चारों ओर शिष्य एकत्र हुए, और 483 में उन्होंने महान लावरा की स्थापना की: ऐसे एकांतवासियों का समुदाय जो सप्ताह भर अकेले रहते और उपासना के लिए एकत्र होते थे। मार साबा के नाम से प्रसिद्ध वह मठ आज भी विद्यमान है और संसार के सबसे पुराने आबाद मठों में से एक है।
साबास ने कई अन्य मठ भी स्थापित किए, पलस्तीन के एकांतवासियों के प्रमुख नियुक्त हुए, और खाल्सेदोन की महासभा के विश्वास की रक्षा करने और प्रजा के लिए मध्यस्थता करने कॉन्स्टेंटिनोपल गए। लगभग तिरानवे वर्ष की आयु में 532 में उनकी मृत्यु हुई।
मरुस्थल हमें ईश्वर की बात सुनना सिखाता है।
आध्यात्मिक जीवन में दोनों आवश्यक हैं।
एक एकांतवासी ने भी व्यापक कलीसिया की सेवा की।
483 में साबास द्वारा स्थापित मठ किद्रोन घाटी की खड़ी चट्टानों से चिपका हुआ है, और पंद्रह सदियों से अधिक समय से वहाँ लगभग निरंतर मठवासी रहते आए हैं।
मौन प्रार्थना की पाठशाला है।
लावरा की जीवन-लय।
प्रार्थना कलीसिया के लिए फल लाती है।
प्रिय भाइयो और बहनो, मार साबा ने युवावस्था में अपना घर छोड़ा और मौन में ईश्वर को खोजने के लिए यहूदिया के मरुस्थल में चले गए। स्तोत्र कहता है: शांत रहो और जान लो कि मैं ही ईश्वर हूँ (स्तोत्र 46:11)।
बहुत लोग उनसे सीखने आए, और उन्होंने महान लावरा की स्थापना की, जहाँ मठवासी सप्ताह भर अकेले रहते और शनिवार और रविवार को पवित्र कुर्बाना के लिए एकत्र होते थे। पंद्रह सदियों बाद भी वह मठ आज खड़ा है।
मार साबा कलीसिया से कटे हुए नहीं थे। वे सच्चे विश्वास की रक्षा और अपने लोगों की सहायता के लिए सम्राट के पास गए। प्रार्थना ने उन्हें सेवा में सशक्त बनाया।
इस उपवास काल में हम प्रतिदिन एक छोटा-सा मरुस्थल खोजें: फ़ोन और शोर के बिना दस मिनट का मौन, ईश्वर के सामने शांत रहने के लिए। आमेन।
हे प्रभु, मार साबा की प्रार्थनाओं से हमें मौन और प्रार्थना सिखा, और हमें अपनी कलीसिया के प्रति निष्ठावान बनाए रख। आमेन।