जापान के शहीद · पर्व: 6 फ़रवरी
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1549 में सुसमाचार संत फ्रांसिस ज़ेवियर के साथ जापान पहुँचा, और कुछ ही दशकों में वहाँ हज़ारों जापानी काथलिक हो गए। पौलुस मिकी का जन्म 1560 के दशक में एक संपन्न जापानी परिवार में हुआ और बचपन में ही उन्हें बपतिस्मा मिला। येसु समाजियों से शिक्षा पाकर वे 1580 के दशक में येसु समाज में भर्ती हुए, और एक प्रतिभाशाली उपदेशक के रूप में जाने गए जो बौद्धों से मसीह के बारे में बात कर सकते थे। जब उन्हें पकड़ा गया, तब उनका पुरोहिताभिषेक निकट था।
शासक तोयोतोमी हिदेयोशी ने 1587 में मिशनरियों के विरुद्ध एक आदेश निकाला था, यद्यपि आरंभ में उसे कड़ाई से लागू नहीं किया गया। 1596 में स्पेन का एक जहाज़, सान फ़ेलिपे, जापान के तट पर टूट गया, और यह संदेह बढ़ा कि मिशनरी विदेशी विजय का मार्ग तैयार कर रहे हैं। उस वर्ष दिसंबर में क्योटो और ओसाका में गिरफ़्तारियाँ शुरू हुईं।
छब्बीस लोगों को दंड सुनाया गया: संत पेत्रुस बपतिस्ता के नेतृत्व में छह फ्रांसिस्की मिशनरी, पौलुस मिकी समेत तीन जापानी येसु समाजी, और सत्रह जापानी लोकधर्मी, जिनमें प्रचारक, एक चिकित्सक, कारीगर और बारह-तेरह वर्ष तक के बालक थे। हर एक के बाएँ कान का एक भाग काट दिया गया, और ख्रीस्तीयों को चेतावनी देने के लिए उन्हें भरी सर्दी में लगभग एक महीने की यात्रा में नगर-नगर से होकर नागासाकी ले जाया गया। वे एक-दूसरे को और उन्हें देखने आनेवालों को प्रोत्साहन देते रहे, और मार्ग भर प्रार्थना करते रहे।
5 फ़रवरी 1597 को नागासाकी के ऊपर की एक पहाड़ी पर उन्हें क्रूसों से बाँधकर भालों से बेधा गया। पौलुस मिकी ने अपने क्रूस से उपदेश दिया और अपने हत्यारों को क्षमा किया। वे 1627 में धन्य और 8 जून 1862 को पोप पियुस नौवें द्वारा संत घोषित हुए। इसके बाद दो सदियों से अधिक समय तक भीषण उत्पीड़न चला और पुरोहित देश में नहीं रह सके। उनकी मृत्यु का स्थान, निशिज़ाका, आज तीर्थस्थल है। चूँकि 5 फ़रवरी संत अगाथा का पर्व है, रोमी पंचांग उनकी स्मृति 6 फ़रवरी को मनाता है।
मरते समय भी पौलुस मिकी मसीह का प्रचार करते रहे।
येसु की तरह उन्होंने अपने हत्यारों को क्षमा किया।
पुरोहित और लोकधर्मी, विदेशी और जापानी, बड़े और बच्चे साथ मरे।
माता-पिता और प्रचारकों ने पीढ़ियों तक पुरोहितों के बिना विश्वास को जीवित रखा।
इस दिन रोमी प्रार्थना-विधि में पढ़ा जानेवाला एक प्रत्यक्षदर्शी का वृत्तांत कहता है कि पौलुस मिकी ने भीड़ से कहा कि वे मसीह का प्रचार करने के कारण मर रहे हैं, कि वे अपने हत्यारों को क्षमा करते हैं, और कि उन्हें आशा है कि उनका रक्त उनके लोगों पर फलदायी वर्षा बनकर गिरेगा।
शहादत के वृत्तांत उनमें सबसे छोटे, लगभग बारह वर्ष के बालक लुइस इबाराकी के बारे में बताते हैं। विश्वास छोड़ने पर उसे जीवनदान का प्रस्ताव मिला, पर उसने इनकार किया। कहा जाता है कि वह अपने क्रूस की ओर दौड़ा और पूछा कि उसका क्रूस कौन-सा है।
मार्च 1865 में, नागासाकी में एक काथलिक गिरजाघर खुलने के कुछ ही समय बाद, कुछ जापानी लोग चुपचाप फ्रांसीसी पुरोहित बर्नार पेतितज़ां के पास आए और बताया कि उनका विश्वास भी वही है। उन्होंने पूछा कि पवित्र मरियम की प्रतिमा कहाँ है। उनके परिवारों ने घर में बपतिस्मा देकर और प्रार्थना करके पुरोहितों के बिना दो सौ वर्ष से अधिक समय तक छिपकर विश्वास को बचाए रखा था।
मुझे मारे जाने का एकमात्र कारण यह है कि मैंने मसीह की शिक्षा सिखाई है। मसीह के उदाहरण पर चलकर मैं अपने उत्पीड़कों को क्षमा करता हूँ। मैं उनसे घृणा नहीं करता। मैं ईश्वर से सब पर दया करने की प्रार्थना करता हूँ, और आशा करता हूँ कि मेरा रक्त मेरे साथी मनुष्यों पर फलदायी वर्षा बनकर गिरेगा।
संत पौलुस मिकी, शहादत का समकालीन वृत्तांत, सार
वे मसीह पर लज्जित हुए बिना नागासाकी तक चले (गलातियों 6:14)।
पौलुस मिकी का अंतिम प्रवचन।
छिपे हुए ख्रीस्तीयों ने दो सदियों तक विश्वास बचाए रखा।
प्रिय भाइयो और बहनो, 1597 की सर्दियों में नागासाकी के मार्ग की कल्पना कीजिए। छब्बीस ख्रीस्तीय घायल अवस्था में, भीड़ों की नज़रों के सामने, लगभग एक महीने तक चलते हैं, और उनमें बालक भी हैं। दंड देनेवाले जापान के ख्रीस्तीयों को डराना चाहते थे। इसके बजाय शहीद मार्ग में गाते और प्रचार करते रहे, और उनका मार्ग मसीह की गवाही बन गया।
संत पौलुस लिखते हैं कि वे हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त के क्रूस को छोड़ और किसी बात पर गर्व नहीं करना चाहते (गलातियों 6:14)। पौलुस मिकी ने इसे अपना लिया। क्रूस से बँधे हुए उन्होंने लोगों से कहा कि वे मसीह की शिक्षा सिखाने के कारण मर रहे हैं। फिर उन्होंने सबसे कठिन बात कही: उन्होंने अपने हत्यारों को क्षमा किया, और आशा की कि उनका रक्त उनके लोगों पर फलदायी वर्षा बनकर गिरेगा।
वह वर्षा सचमुच हुई। दो सदियों से अधिक समय तक जापान में पुरोहित नहीं थे। फिर भी जब 1865 में एक फ्रांसीसी पुरोहित ने नागासाकी में गिरजाघर खोला, तो ऐसे लोग उनके पास आए जिन्होंने छिपकर विश्वास को बचाए रखा था। माता-पिता ने अपने बच्चों को बपतिस्मा दिया, उन्हें प्रार्थनाएँ सिखाईं, और उनसे कहा कि एक दिन पुरोहित लौटेंगे। माताओं और पिताओं ने कलीसिया को जीवित रखा।
हम बिना भय के पवित्र मिस्सा / पवित्र कुर्बाना में आ सकते हैं। आइए, इसे मामूली बात न समझें। आज विश्वास के लिए दुख उठानेवाले ख्रीस्तीयों के लिए प्रार्थना करें। अपने बच्चों को घर में प्रार्थना करना सिखाएँ, ताकि विश्वास केवल गिरजाघर की बातों पर निर्भर न रहे। और जब कोई हमें घायल करे, तो क्रूस पर पौलुस मिकी को याद करें और क्षमा करने की कृपा माँगें। आमेन।
हे ईश्वर, तू अपने सब संतों का बल है। तूने संत पौलुस मिकी और उनके साथियों को क्रूस के द्वारा अनंत जीवन के लिए बुलाया। उनकी प्रार्थनाओं से हमें यह वरदान दे कि हम मृत्यु तक अपने विश्वास को दृढ़ता से थामे रहें और हमें चोट पहुँचानेवालों को क्षमा करें। आमेन।